
कुल्लू दशहरा की पौराणिक एवं ऐतिहासिक कहानी
हिमाचल प्रदेश की देवभूमि कुल्लू में मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा देश के अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। जहाँ भारत के अधिकतर हिस्सों में विजयदशमी के दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का उत्सव मनाया जाता है, वहीं कुल्लू में इस दिन से भगवान रघुनाथ जी के सम्मान में सात दिवसीय उत्सव आरंभ होता है।
इस उत्सव में कुल्लू घाटी के सैकड़ों देवी-देवता अपनी पालकियों में विराजमान होकर भगवान रघुनाथ जी के दरबार में पहुँचते हैं।

राजा जगत सिंह और ब्राह्मण दुर्गा दत्त की कथा
सत्रहवीं शताब्दी में कुल्लू पर राजा जगत सिंह का शासन था। लोककथा के अनुसार, राजा को पता चला कि दुर्गा दत्त नामक एक ब्राह्मण के पास अनमोल मोती हैं। राजा ने उन मोतियों को पाने के लिए ब्राह्मण पर दबाव डालना शुरू कर दिया।
ब्राह्मण ने बार-बार समझाया कि उसके पास ऐसे कोई मोती नहीं हैं, लेकिन राजा ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। राजा के दबाव और उत्पीड़न से दुखी होकर ब्राह्मण दुर्गा दत्त ने अपने परिवार सहित अपने घर में आग लगा ली और अपने प्राण त्याग दिए।
इसी घटना को कुल्लू दशहरे की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। आज भी कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ जी को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है और सैकड़ों देवी-देवता उनके सम्मान में ढालपुर मैदान में एकत्रित होते हैं।
2. राजा पर आया संकट
इस दुखद घटना के बाद लोकमान्यता के अनुसार, राजा जगत सिंह को कोढ़ (कुष्ठ रोग) हो गया। राजा को अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ। वह शारीरिक और मानसिक पीड़ा से व्याकुल रहने लगा। कहा जाता है कि उन्हें पानी भी रक्त के समान दिखाई देने लगा और वे अपने किए पर पछताने लगे।
राजा ने अपनी पीड़ा दूर करने के लिए संतों और विद्वानों से मार्गदर्शन माँगा।
उन्हें भगवान श्रीराम के स्वरूप भगवान रघुनाथ जी की शरण लेने की सलाह दी गई। इसके बाद राजा ने अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा कुल्लू लाने का संकल्प लिया।
3. अयोध्या से कुल्लू आए भगवान रघुनाथ जी
परंपरागत कथा के अनुसार, राजा के आदेश पर एक ब्राह्मण को भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा लाने के लिए अयोध्या भेजा गया।
कई कठिनाइयों के बाद भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा कुल्लू लाई गई और विधि-विधान से स्थापित की गई।
राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ जी को अपने राज्य का वास्तविक स्वामी स्वीकार किया और स्वयं को उनका सेवक माना। लोकविश्वास के अनुसार, भगवान की शरण में आने के बाद राजा को अपनी पीड़ा से मुक्ति मिली और उनके जीवन में शांति लौट आई।
इसी घटना को कुल्लू दशहरे की परंपरा का प्रमुख आधार माना जाता है।
4. कुल्लू दशहरा विजयदशमी से ही क्यों शुरू होता है?
देश के अनेक हिस्सों में विजयदशमी के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर दशहरे का समापन किया जाता है।
लेकिन कुल्लू में विजयदशमी के दिन ही दशहरा उत्सव आरंभ होता है।
इस दिन भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा को भव्य रथ में विराजमान किया जाता है। भक्तगण श्रद्धापूर्वक रथ को खींचते हैं और ढालपुर मैदान में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
कुल्लू घाटी के विभिन्न गाँवों से देवी-देवता सुंदर पालकियों में सवार होकर इस उत्सव में शामिल होते हैं। सभी देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी के दरबार में उपस्थित होकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
यह दृश्य हिमाचल प्रदेश की प्राचीन देव संस्कृति, आस्था और आपसी एकता का अद्भुत प्रतीक है।
5. सातवें दिन लंका दहन की परंपरा
कुल्लू दशहरे के अंतिम दिन लंका दहन से जुड़ी एक पारंपरिक धार्मिक रस्म निभाई जाती है।
इस अवसर पर ब्यास नदी के किनारे निर्धारित स्थान पर काँटेदार झाड़ियों और अन्य पारंपरिक सामग्री के माध्यम से प्रतीकात्मक अनुष्ठान किया जाता है।
इसके बाद धार्मिक विधियाँ पूरी होती हैं और विभिन्न गाँवों से आए देवी-देवता अपने-अपने मंदिरों की ओर लौट जाते हैं। इस प्रकार सात दिनों तक चलने वाला यह भव्य देव महाकुंभ संपन्न होता है।
कुल्लू दशहरे की विशेषताएँ
भगवान रघुनाथ जी की प्रधानता: पूरे उत्सव का केंद्र भगवान रघुनाथ जी होते हैं।
सैकड़ों देवी-देवताओं का मिलन: घाटी के विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवता एक स्थान पर एकत्रित होते हैं।
देव संस्कृति का संरक्षण: पारंपरिक वाद्ययंत्र, लोकनृत्य, वेशभूषा और धार्मिक रीति-रिवाज इस उत्सव की पहचान हैं।
आस्था और एकता का संदेश: यह पर्व लोगों को अपनी संस्कृति, परंपराओं और देवी-देवताओं से जोड़ता है।
कुल्लू दशहरे से मिलने वाली सीख
कुल्लू दशहरे की कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और अन्याय मनुष्य को दुःख की ओर ले जाते हैं, जबकि पश्चाताप, श्रद्धा और सत्य के मार्ग पर चलने से जीवन में शांति आती है।




